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सोमवार, १९ डिसेंबर, २०११

पत्रकारों का दुश्मन कौन ?

हमारे टीवी ९ के बुलढाना के पत्रकार गणेश प्रकाश सोलंकी पर कुछ गुंडों ने हमला कीया / उसको बड़ी बेरहमी से पिटा गया / इस घटना के बाद पत्रकारों पर दिन ब दिन बढ़ रहे हमलो की बात फिर से चर्चा मे आ गयी / कुछ पत्रकारों ने इस घटना की निंदी की तो कुछ लोगो ने आपने तरीके से विरोध कीया और सरकार पर निशाना साधते हुवा सरकार को कसूरवार टेहराया ...

सरकार पत्रकारों के खिलाफ है / लगभग ३ साल हो गए सरकार सिर्फ अस्वाशन दे रही है / इसमे सरकार की गलती नहीं है कुछ हमारे पत्रकारों की भी गलती है , वो कुछ मंत्रियो की चापलूसी करते है वो गलत है / इससे सरकार की हिमत बढ़ रही है / कुछ लोग आपने निजी फायदे के लीये सरकार को परदे के पीछे से मदद कर रहे है / हमारे कुछ लोग ही हमारे दुश्मन है /

सरकार field पर काम करने वाले पत्रकारों के लीये accridation यानि अधिस्वीकृति कार्ड देती है / इस की समितिमे सभी पत्रकार लोग होते है , वही पत्रकारों को अधिस्वीकृति की मंजूरी देती है / लेकिन इस समिति ने देश मे का इक गजब का कानून हमारे ही पत्रकार लोगो के लीये बनाया है , अगर किसी भी पत्रकार पर इक भी मामला पुलिस मे दर्ज हो तो उसको अधिस्वीकृति कार्ड नहीं दीया जायेगा / कानून से पहले ही इन पत्रकारों ने दोषी ठहराते हुवे इस समिति ने फैसला दीया है और सजा भी दे दी है / इस नियम के चलते कई पत्रकार अधिस्वीकृति से आज भी वंचित है / पत्रकार के उपर जैसे हमला होता है ,वैसे ही उनपर कई फर्जी मामले दर्ज होते है /

हलाकि हमारे देश का कानून बनाने वाले लोकसभा मे ६० फीसदी सांसदों पर डकैती , हत्या , अपहरण , बलात्कार , घोटाले जैसे कई गंभीर मामले दर्ज है , कुछ तो अभी भी जेल मे भी है / इसके बावजूद वो देश की सर्वोच्च लोकसभा मे है और कानून पारित करते है / लेकिन हमारे पत्रकारों को इक मामूली मामला दर्ज होने से अधिस्वीकृति नहीं मिलती , यही सच है / दरसल सरकार को इस नियमसे कुछ भी लेना देना नहीं है , हमारे ही कुछ पत्रकारों ने गुटबाजी मे यह नियम बनाकर रखा है / पुराने पत्रकारों को अधिस्वीकृति कार्ड मिला है लेकिन , नये लोगो को काफी तखलीफ़ हो रहि है / यह नियम तो इक Exampel है , आयसी कई बाते है , जो की पत्रकारों ने पत्रकारों के खिलाफ की है / कुछ ने निजी फायदे के लीये , तो कुछ ने चंद पैसो के लीये /

अगर किसी पत्रकार पर हमला होता है तो पत्रकार इसका विरोध भी नहीं कर सकता / जब भी किसी पत्रकार पर हमला होता है तो हम पत्रकार जोर शोर से चिल्लाते है , अनशन , आन्दोलन करते है / लेकिन उपर दी गयी बातो के अलवा अन्य बातो पर कोन सोचेगा / अगर अयसा है तो कोन किसका नुकसान कर रहा है / सरकार या पत्रकार / अभी भी सोचो , वक्त है / इक दुसरे की गलतिया मत निकालो , गुटबाजी मत कारो , इसका फायदा सरकार , कुछ राजनेता , कुछ गुंडे लोग उठा रहे है /

गुंडों को उनकी ही भाषा मे समजाने की जरुरत है / वो अनशन , कानून की भाषा नहीं समजते / कुछ पत्रकारों को शायद यह भाषा हजम नहीं होगी ( पत्रकारों ने गुंडों को विरोध करना भी गलत है ) , लेकिन क्या करे दोस्तों यही सचाई है / बीड का जो पत्रकार है उसके पैर तोड़े , उसके बाद राज्य मे अनशन कीया क्या हासिल हुवा / मरने के बाद रोने से कुछ हासिल नहीं होता / Tit For Tat / कई दिनों से यह कहना चाता था लेकिन आज वक़्त था , तो लिखा /

हमको कुछ ठोस निर्णय लेने की अब जरुरत है / सभी पत्रकार इसके बारे मे सोचे / सभी इक हो जावो , कुछ ठोस कदम उठावो यार , नहीं तो हर रोज इक पत्रकार मर जायेगा और हम अय्से ही रोते रह जायंगे / कई ग्रामीण पत्रकार अलग अलग समस्या , अत्याचार से जुज रहे है / उनपर के हमले की खबर भी बाहर नहीं आती / स्तिथी बहुत गंभीर बन रही है / वो बिचारा ग्रामीण पत्रकार कई लोगो की दुश्मनी लेते हुवे खबरे हमको भेजता है हम उसको क्या protection देते है , यह सोचने की बात है / आयसी घटनाओ मे प्रिंट मीडिया से जयादा protection हमारे इलेक्ट्रोनिक्स मीडिया के Senior हमें देते है वो अभी भी आची बात है /

हम लोगो की समस्या सुल्जाते है , लेकिन हम हमारी समस्या सुल्जाते नहीं, यह कितना बुरा है ना ... जनांदोलन खड़ा करो / हर जिले मे आच्हे लोगो को साथ लेकर आवाज उठाने की जरुरत है / सिर्फ बातो से और तत्वों से जान नहीं बचती ...

शायद कुछ पत्रकार लोगो को यह बाते बुरी भी लग सकती है ....
 
संतोष जाधव,
टीवी.9 रिपोर्टर, उस्मानाबाद

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