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रविवार, १९ फेब्रुवारी, २०१२

मीडिया प्राइवेट लिमिटेड के हाथ पत्रकारिता की डोर


2100 करोड़ रूपये की एक बड़ी डील और भारतीय मीडिया की पूरी दुनिया बदल गयी. मुकेश अंबानी की रिलायंस इंडस्ट्रीज (आरआईएल) ने राघव बहल के स्वामित्व वाले टीवी18 और नेटवर्क18 के साथ करार कर मीडिया की दुनिया में मजबूत दखल बना ली. इस करार के तहत टीवी 18 ब्रॉडकास्ट लिमिटेड और नेटवर्क 18 मीडिया एंड इंवेस्टमेंट लिमिटेड इश्यू के जरिए पूंजी बाजार में उतरेगी और आरआईएल की सहयोगी इकाई इंडीपेंडेंट मीडिया ट्रस्ट इनके शेयर खरीदेंगी. इससे रिलायंस की इन कंपनियों में हिस्सेदारी 30 प्रतिशत तक हो जाने की संभावना है.
करार के अनुसार दोनों कंपनियों के कार्यक्रमों के कंटेंट और डिस्ट्रीब्यूशन पर पहला अधिकार आरआईएल की सहयोगी कंपनी इंफोटेल ब्राड बैंड सर्विसेस लिमिटेड का होगा. इसके अलावा आने वाले समय में टीवी 18 समूह की ये दोनों कंपनियां एक अन्य मीडिया समूह ईटीवी का अधिग्रहण करेंगी. इस अधिग्रहण में लगने वाली 2100 करोड़ की रकम मुकेश अंबानी के स्वामित्व वाली कंपनी रिलायंस इंडस्ट्रीज लगायेगी. इस तरह एक ही झटके में दो बड़े मीडिया समूह रिलायंस इंडस्ट्रीज के प्रभावक्षेत्र में आ जायेंगे. 
बिजनेस के लिहाज से देखा जाए तो यह महज एक बड़ी बिजनेस डील है. बिजनेस की दुनिया में ऐसे गठबंधन होते रहते हैं. लेकिन क्या इसे महज एक बिजनेस डील मानना सही होगा? दरअसल इस डील से मीडिया और पत्रकारिता की दुनिया पर दूरगामी असर पड़ने वाला है. ऐसी आशंका है कि इससे पत्रकार कहीं पूरी तरह से मीडिया प्राइवेट लिमिटेड के हाथ की कठपुतली न बन कर रह जाएँ. कॉरपोरेट और बिजनेस जगत की खबरें सिरे से न गायब हो जाएँ और जो खबरें आये वो पीआर जर्नलिज्म का केवल हिस्सा न हो, जिसकी संभावना बहुत अधिक है. यूँ भी रिलायंस ने जिस टीवी18 और नेटवर्क18 ग्रुप के साथ करार किया है उसके न्यूज़ चैनलों (सीएनएन-आईबीएन, आईबीएन-7 ) के एडिटर-इन-चीफ राजदीप सरदेसाई कॉरपोरेट के हाथ खुद को लाचार पहले ही बता चुके हैं. संपादकों की लाचारी की यह व्यथा - कथा वे कई बार कई सेमिनारों में बता चुके हैं.
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उदयन शर्मा ट्रस्ट द्वारा आयोजित परिचर्चा (संवाद2010) में राजदीप ने सीधे - सीधे स्वीकार किया था कि कॉरपोरेट के हाथों संपादक मजबूर है. उन्होंने कहा था कि मीडिया के भीतर जिस तरह के ऑनरशिप का मॉडल बना है,उसमें एडीटर बहुत कुछ करने की स्थिति में नहीं है. इसके अलावा नीरा राडिया टेप प्रकरण में वे दागी पत्रकारों का बचाव कर भी अपनी मंशा जाहिर कर चुके हैं. इसलिए उनसे कुछ आशा करना ही व्यर्थ होगा. ऐसे में बड़ी खबरों के साथ किस हद तक समझौता किया जाएगा, यह समझना कोई मुश्किल काम नहीं. यह तय है कि रिलायंस के खिलाफ ख़बरें तो नहीं ही होगी, साथ में दूसरे कॉरपोरेट घराने और उनके घोटाले की खबरें भी सिरे से गायब हो सकती है. या फिर ख़बरें तभी आएगी जब कॉरपोरेट वार जैसी कोई स्थिति उत्पन्न होती है और एक - दूसरे को शिकस्त देने की ज़द्दोजहद में मीडिया को टूल की तरह इस्तेमाल किया जाने लगे. 2G स्पेक्ट्रम घोटाले में कुछ - कुछ ऐसा हम देख चुके है. 
लब्बोलुआब यह है कि न्यूज़ कंटेंट पर इसका गहरा असर पड़ेगा और कॉरपोरेट के आगे पत्रकारिता की धार और कुंद होगी. कॉरपोरेट पत्रकारिता का बोलबाला होगा और 2G स्पेक्ट्रम जैसे और भी घोटाले होंगे और इन घोटालों में कई पत्रकार कॉरपोरेट एजेंट की तरह काम करेंगे. क्षेत्रीय स्तर पर भी इसका असर पड़ेगा. ईटीवी के क्षेत्रीय चैनल जो काफी लोकप्रिय हैं, उनका कंटेंट भी प्रभावित होगा और संरचनात्मक ढाँचे में परिवर्तन हो सकता है. सिर्फ वही ख़बरें दिखाई जायेंगी जिससे रिलायंस जैसे कॉरपोरेट घरानों को फायदा हो या कम - से - कम कोई नुकसान न हो. गौरतलब है कि बिजनेस के लिहाज से कॉरपोरेट की नज़र अब अपेक्षाकृत छोटे शहरों और गाँवों की तरफ है. रुरल मार्केटिंग के लिए बाकायदा योजना बनायी जा रही है. इस योजना में ईटीवी जैसे क्षेत्रीय स्तर के न्यूज़ चैनल और अखबार बड़े काम के साबित होंगे जिसपर कॉरपोरेट का पहले से ही अधिकार होगा. 
कॉरपोरेट के प्रभाव से कंटेंट किस तरह प्रभावित हो सकता है, इसका एक छोटा सा उदाहरण अंग्रेजी अखबार 'द हिन्दू' ने पेश किया, जिसे बौद्धिक जगत में अपेक्षाकृत निर्भीक और निष्पक्ष अखबार समझा जाता है. रिलायंस और टीवी18 / नेटवर्क18 के बीच हुए गठबंधन पर मीडिया मामलों की जानकार सेवंती नैनन ने द हिन्दू के लिए एक लेख लिखा था, जिसे अखबार ने छापने से मना कर दिया. बाद में 'द हूट' नाम के मीडिया वेबसाईट पर यह लेख 'बिग ब्रदर टू द रिस्क?' शीर्षक से प्रकाशित हुआ. इस लेख को न छापने के पीछे 'द हिन्दू' की नीयत को बखूबी समझा जा सकता है. इसी अखबार में पी.साईनाथ ने अपने लेख ‘दि रिपब्लिक ऑन ए बनाना पील' (3 दिसंबर 2010) में लिखा था कि आज मीडिया कॉरपोरेट के साथ नहीं बल्कि खुद कॉरपोरेट होकर काम कर रहा है. दरअसल मीडिया कॉरपोरेट का समर्थन करके एक तरह से अपना ही समर्थन कर रहा होता है. संभवतया सेवंती नैनन के लेख को प्रकाशित न करने के पीछे 'द हिन्दू' की यही मानसिकता छिपी हो. यह उस अखबार का हाल है जिसका सीधे - सीधे इस बिजनेस डील से कोई लेना - देना नहीं है. फिर कॉरपोरेट के साथ जिस मीडिया संस्थान का गठबंधन हो रहा है उसमें खबरों और कंटेंट का प्रभावित होना तो तय है. 
रिलायंस जैसे बड़े कॉरपोरेट हाउस के मीडिया के धंधे में सीधे - सीधे कूदने से एक और बड़ा संकट पैदा होगा. छोटे और मझोले मीडिया संस्थानों का अस्तित्व संकट में पड़ जाएगा. मीडिया मामलों की विशेषज्ञ सेवंती नैनन ने इसी ओर इशारा करते हुए ‘द हूट’ वेबसाईट पर अपने लेख 'बिग ब्रदर टू द रिस्क?' में लिखा है कि पूंजी की जरूरत के चलते कैसे भारत में मीडिया बिजनेस शुरू करने वाले मूल लोगों के हाथों से निकलकर धीरे - धीरे बड़े कॉरपोरेट के हाथों जा रहे हैं. दूसरे मीडिया संस्थानों खासकर छोटे मीडिया संस्थानों के सामने भी यही समस्या है. उन्हें या तो गठबंधन करना पड़ेगा या फिर मिटना होगा. रिलायंस जैसी कम्पनियों के सामने बिना बड़ी पूंजी और संरचनात्मक ढाँचे के छोटे और मझौले मीडिया संस्थानों का टिकना कठिन है. यूँ भी रिलायंस ग्रुप के कम्पनियों की यह फितरत रही है कि बाज़ार पर इस कदर छा जाओ कि प्रतिद्वंदियों का नामो - निशान मिट जाए. इस प्रतिस्पर्धा में छोटे - मोटे मीडिया संस्थान तो यूँ ही हवा हो जायेंगे. ऐसे में एक मोनोपोली की स्थिति पैदा होगी और ऐसी स्थिति पैदा होगी जो आज से भी ज्यादा विकट होगी. तब पत्रकारिता की डोर पूरी तरह से मीडिया प्राइवेट लिमिटेड के हाथ में होगी और मीडिया प्राइवेट लिमिटेड के कॉरपोरेट जर्नलिस्टों का बोलबाला होगा. पत्रकारिता हाशिए पर होगी और मीडिया संस्थान की जवाबदेही पाठक के प्रति कम और शेयरधारकों के प्रति ज्यादा होगी.
 
पुष्कर पुष्प

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