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शुक्रवार, २१ डिसेंबर, २०१२

कब और कैसे लागू होगा मजीठिया वेतनमान?

हमारे गांवों में एक कहावत है कि हर बहे से खर खाए बकरी अँचार खाए अर्थात जो बैल हल में जुते उसके हिस्से घास-भूसा और जो बकरी बैठी-बैठी में-में करती रहे उसके भोजन में स्वादिष्ट अचार.खैर,बैलों द्वारा खेती तो बंद हो गयी लेकिन इस कहावत में जो व्यंग्य छिपा हुआ था आज भी अपनी जगह सत्य है और सिर्फ गांवों ही नहीं बल्कि शहरों के लिए भी उतना ही सत्य है.अब समाचारों की दुनिया को ही लें कोल्हू के बैल की तरह;खासतौर पर निचले स्तर के मीडियाकर्मी दिन-रात खटते रहते हैं और महीने के अंत में जब पैसा हाथ में आता है तो इतना भी नहीं होता कि जिससे उनका और उनके परिवार का १० दिन का खर्च भी निकल सके.ऐसा भी नहीं है कि उनकी नियोक्ता मीडिया कम्पनियाँ ऐसा मजबूरी में करती हैं बल्कि अगर हम उनकी सालाना बैलेंस शीट को देखें तो पाएँगे कि वे तो हर साल भारी लाभ में होती हैं.हाँ,यह बात अलग है कि अकूत धन के ढेर पर बैठा उसका मालिक पूरे लाभ को अकेले ही हजम कर जाना चाहता है और चाहता क्या है वह बाजाप्ता ऐसा कर भी रहा है.इस तरह भारतीय मीडिया उद्योग में कमाएगा लंगोटीवाला और खाएगा धोतीवाला वाली कहावत बड़े ही मजे में चरितार्थ हो रही है.
                   मित्रों,हमारे पूर्वज राजनीतिज्ञों ने,जिनमें से अधिकतर कभी-न-कभी पत्रकार भी रह चुके थे;आनेवाले समय में हृदयहीन पूँजी के हाथों पत्रकारों की संभावित दुर्गति को अपनी दूरदृष्टि के माध्यम से साफ-साफ देख लिया था और इसलिए उन्होंने प्रेस अधिनियम द्वारा उनके हितों की रक्षा करने की कोशिश की.हालाँकि,आश्चर्यजनक रूप से इलेक्ट्रोनिक और वेब मीडिया कर्मी अभी भी इस सुरक्षा छतरी से बाहर हैं.क्यों बाहर हैं शायद सरकार को पता हो लेकिन जो इसके दायरे में आते हैं उन समाचारपत्र कर्मचारियों को भी दुर्भाग्यवश इस अति महत्वपूर्ण कानून का फायदा नहीं मिल पा रहा है.उन्हें इसके दायरे से बाहर करने के लिए कई तरह के सादे प्रपत्रों पर नियुक्ति के समय ही हस्ताक्षर करवा लिया जाता है और फिर मिल जाती है प्रबंधन को छूट उनकी रोटी के साथ खुलकर खेलने की.यानि सरकार जब तक पेड़ पर चढ़ने को तैयार होती है तब तक मीडिया कंपनियों के मालिक पात-पात को गिन आते हैं.भारत का ऐसा कोई भी कानून नहीं जिसमें कुछ-न-कुछ लूप होल्स नहीं हो,कमियाँ न हों फिर पूंजीपतियों के पास तो हमेशा उनके साथ नाभिनालबद्ध दुनिया के सबसे बेहतरीन दिमाग भी होते हैं;हर जोड़ का तोड़ निकालने के लिए.
              मित्रों,सभी पत्रकार व गैर पत्रकार समाचार-पत्र कर्मियों के लिए मजीठिया वेतन आयोग की सिफारिशों को आए एक साल होने को है लेकिन कोई भी समाचार-पत्र या समाचार एजेंसी प्रबंधन के कानों पर जूँ तक नहीं रेंग रही;ऊपर से वे मजीठिया की सिफारिशों का विरोध भी कर रहे हैं.उनमें से कुछ तो कथित न्याय की आशा में न्यायालय भी पहुँच गए परन्तु सर्वोच्च न्यायालय ने उन्हें राहत देने से मना कर दिया और सब कुछ सरकार पर छोड़ दिया.
                    मित्रों,इस प्रकार इस समय जो वस्तु-स्थिति है वो यह है कि मीडिया कंपनियों के मालिक किसी भी स्थिति में अपने कर्मचारियों को मजीठिया आयोग की सिफारिशों के अनुरूप वेतन बढाकर अपने मुनाफे को कम करने को तैयार नहीं हैं और वे इसके लिए कुछ भी कर गुजरने को तैयार हैं.क्या वे भारतवर्ष के सारे कानूनों से परे हैं?संविधान में तो ऐसा कुछ नहीं लिखा.अभी कुछ भी दिन पहले मैंने bhadas4media पर यह समाचार देखा कि दैनिक जागरण,कानपुर ने अपने कर्मचारियों से जबरन एक प्रपत्र पर हस्ताक्षर भी करवा लिया है.उस कथित प्रपत्र पर यह लिखा हुआ है कि ''मैं जागरण की सेवाओं से संतुष्ट हूं और जागरण मेरे और मेरे परिवार के हितों की पूरी तरह सुरक्षा कर रहा है. मुझे मजीठिया आयोग की सिफारिशों के अनुरूप कोई वेतनमान नहीं चाहिए.''अब आप ही बताईए बेचारे दस्तखत नहीं करें तो करें क्या?ऐसा नहीं करने पर उन्हें बिना कोई कारण बताए बाहर का दरवाजा दिखा दिया जाएगा और यह तो आप भी जानते हैं कि तुलसीदास के ज़माने से ही ''तुलसी बुझाई एक राम घनश्याम ही ते,आगि बड़वागि ते बड़ी है आगि पेट की''.हो सकता है कि ऐसे मीडियाकर्मियों के पेट पर लात मारने का हस्ताक्षर अभियान गुप्त रूप से अन्य मीडिया कंपनियों में भी चलाया जा रहा हो.
               मित्रों,जाहिर है समाज के दबे,कुचलों और पीड़ितों को न्याय दिलानेवाले मीडियाकर्मी खुद ही अन्याय के सबसे बड़े शिकार हैं.अगर उन्होंने पूर्वोक्त प्रपत्र पर हस्ताक्षर कर दिया तो फिर वे मजीठिया आयोग की सिफारिशों से कथित रूप से अपनी मर्जी से पूरी तरह से वंचित रह जाएँगे.अब यह भारत सरकार पर निर्भर करता है कि वह इस आयोग की सिफारिशों को लागू कराने की दिशा में किस हद तक जाती है.कुछ इसी तरह की स्थिति १९८९ में भी बनी थी.तब भी मीडिया कम्पनियाँ बछावत आयोग की सिफारिशों को लागू करने में नानुकूर कर रही थीं लेकिन तब स्व.राजीव गाँधी की सरकार ने सख्ती बरतते हुए उन्हें बछावत आयोग की सभी सिफारिशों को लागू करने के लिए बाध्य कर दिया था.परन्तु आज स्थिति बिलकुल उलट है.आज केंद्र में अब तक की सबसे भ्रष्ट और कमजोर-कामचोर सरकार सत्ता में है.उस पर नीम पर करेला यह कि यह सरकार बाजार को ही भगवान मानते हुए सबकुछ बाजार के हवाले कर देने की सख्त हिमायती भी है.उस करेले पर चिरैता यह कि सरकार कथित कार्पोरेट संस्कृति की भी अंधसमर्थक है.फिर भी अगर सरकार ने सोडा वाटर के नशे (जोश) में आकर सख्ती बरती और मजीठिया वेतन आयोग की सिफारिशें लागू हो भी गईं तब भी लगभग सारे कर्मियों के पल्ले कुछ नहीं पड़ने वाला क्योंकि तब तक वे बिना कोई विरोध किए एकतरफा संधि-प्रपत्र या और भी स्पष्ट रूप से कहें तो आत्मसमर्पण-पत्र अथवा सुसाईडल नोट पर हस्ताक्षर कर चुके होंगे.इसलिए अगर सरकार इस वेतन-आयोग की सिफारिशों को लागू करवाना ही चाहती है और सही मायने में लागू करवाना चाहती है तो फिर उसे मीडिया कंपनियों द्वारा चलाए जा रहे हस्ताक्षर अभियान का तोड़ भी निकालना पड़ेगा.


मजीठिया आयोग की सिफारिशों का मजाक




पत्रकारों के वेतनमान को लेकर बने मजीठिया आयोग की सिफारिशों को मजाक बनाया जा रहा है. बड़े अखबारी घराने और मीडिया हाउस मजीठिया आयोग के बारे में भ्रामक जानकारियां फैला रहे हैं और उनकी सरगना संस्था इंडियन न्यूजपेपर सोसायटी इस काम में उनका साथ दे रही है. मसलन अखबारों में विज्ञापन दिये जा रहे हैं कि अगर आयोग की सिफारिशें लागू हो गयीं तो चपरासी को भी चालीस हजार की तनख्वाह देनी पड़ेगी. ये अफवाहें और मजीठिया आयोग की ये सिफारिशें सिर्फ एक हजार करोड़ से ऊपर के कारोबार वाले घराने पर लागू होते हैं. मजीठिया आयोग की सिफारिशों को मजाक बनाये जाने पर आनंद प्रधान का विश्लेषण-
अख़बारों और न्यूज एजेंसियों में काम करनेवाले पत्रकारों और गैर पत्रकार कर्मचारियों का वेतन आदि तय करने के लिए गठित जस्टिस जी.आर मजीठिया वेतन आयोग की सिफारिशों के खिलाफ अखबार मालिकों ने चौतरफा युद्ध सा छेड दिया है. वे किसी भी कीमत पर इन सिफारिशों को लागू करने के लिए तैयार नहीं हैं. उनके जबरदस्त दबाव का नतीजा है कि यू.पी.ए सरकार पिछले छह महीने से इस रिपोर्ट को दबाए बैठी है. हालाँकि प्रधानमंत्री ने अब पत्रकारों और गैर पत्रकारों के एक साझा प्रतिनिधिमंडल से वायदा किया है कि वे “अपनी ड्यूटी निभाएंगे.”
लेकिन सच्चाई यही है कि अभी तक उनकी सरकार ने इस मामले में अपनी जिम्मेदारी और जवाबदेही का पालन नहीं किया है. अगर उन्होंने अपनी ड्यूटी निभाई होती तो अब तक मजीठिया वेतन आयोग की सिफारिशें नोटिफाई कर दी गई होतीं. इसके उलट सरकार अखबार मालिकों के दबाव में है और उनके साथ मिलकर मजीठिया आयोग की सिफारिशों की हत्या करने में जुटी हैं. यही कारण है कि सरकार अखबार मालिकों को इस बात का पूरा मौका दे रही है कि वे इन सिफारिशों के खिलाफ न सिर्फ झूठा, एकतरफा और मनमाना अभियान चलाएं बल्कि कोर्ट से लेकर अन्य मंचों पर उसे ख़ारिज करने के लिए जमकर लाबींग करें.
नतीजा यह कि मजीठिया आयोग की सिफारिशों के खिलाफ अखबार मालिकों का अभियान जारी है. वे अपने अख़बारों और पत्रिकाओं में इन सिफारिशों के खिलाफ खबरें, विज्ञापन और संपादकीय पृष्ठ पर लेख लिख और छाप रहे हैं. उनमें कई खासकर विज्ञापन तो बहुत अपमानजनक हैं. मजे की बात यह है कि इन अखबारों में पत्रकारों और गैर पत्रकारों के पक्ष में न तो खबरें छप रही हैं और न ही लेख और संपादकीय.
आखिर अखबार की आज़ादी, पत्रकारों की नहीं बल्कि अखबार मालिकों की आज़ादी है. वे जो चाहते हैं, उनके अख़बारों में वही छपता है. जिनको अभी भी मुगालता हो कि प्रेस की आज़ादी का मतलब पत्रकारों की आज़ादी हैं, उनकी आँखें इस प्रकरण से खुल जानी चाहिए. आश्चर्य नहीं कि अख़बारों में मजीठिया वेतन आयोग के खिलाफ लगातार छप रहा है जबकि वेतन आयोग की सिफारिशों को लागू करने की मांग कर रहे पत्रकारों और गैर पत्रकारों के संघर्षों की वास्तविक खबरें और रिपोर्टें कुछ अपवादों को छोडकर कहीं नहीं छप रही हैं.
अखबार मालिकों की पत्रकारों के वेतन आयोग से कई तरह की नाराजगी है. उनका कहना है कि जब किसी अन्य उद्योग या क्षेत्र यहाँ तक कि इलेक्ट्रानिक मीडिया के पत्रकारों के लिए वेतन आयोग नहीं है तो पत्रकारों के लिए अलग से वेतन आयोग क्यों होना चाहिए? उनका आरोप है कि वेतन आयोग की आड़ में सरकार पत्रकारों की वफ़ादारी खरीदना चाहती है.
अखबार मालिकों का यह भी कहना है कि अगर मजीठिया आयोग की सिफारिशों को लागू कर दिया गया तो ज्यादातर अखबार बढे हुए वेतनों का बोझ नहीं उठा पाएंगे और बंद हो जाएंगे. उनके मुताबिक, मजीठिया आयोग ने पत्रकारों और गैर पत्रकारों के वेतन में अस्सी से सौ फीसदी तक बढोत्तरी की सिफारिश की है.
यही नहीं, अखबार मालिकों की संस्था- आई.एन.एस के एक विज्ञापन में बड़े अपमानजनक तरीके से कहा गया है कि इन सिफारिशों के मुताबिक अखबार के चपरासी और ड्राइवर को भी ५०००० हजार रूपये तक की तनख्वाह देनी पड़ेगी. उनका कहना है कि इतना तो सरकार भी अपने ड्राइवरों और चपरासियों को नहीं देती है. यह और बात है कि विज्ञापन के नीचे २ पॉइंट में बताया गया है कि यह सिफारिश उन अख़बारों के लिए है जिनका सालाना टर्नओवर १००० करोड़ रूपये से अधिक का है.
अखबार मालिकों का आरोप है कि सरकार वेतन आयोग के बहाने आज़ाद प्रेस को खत्म करना चाहती है और यह लोगों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला है. इसलिए उनकी मांग है कि सरकार तुरंत मजीठिया आयोग की सिफारिशों को नामंजूर करे और प्रेस की आज़ादी को बनाये रखने के लिए पत्रकारों के वेतन और अन्य सेवाशर्तों को तय करने का अधिकार मालिकों के हाथ में रहने दे.
साफ है कि अखबार मालिकों और उनकी संस्था-आई.एन.एस की नाराजगी की जड़ में असली मकसद यही है. वे अपनी मनमर्जी से पत्रकारों का वेतन और अन्य सेवाशर्तें तय करने का अधिकार कतई नहीं छोड़ना चाहते हैं. वैसे इससे बड़ा भ्रम और कुछ नहीं है कि सरकार मजीठिया आयोग की सिफारिशें नोटिफाई कर देती है तो अखबार मालिक उसे लागू कर देंगे.
सच यह है कि अगर मजीठिया वेतन आयोग लागू भी हो गया तो भी उसका वही हश्र होगा जो इससे पहले मणिसाना या बच्छावत वेतन आयोगों का हुआ था. तथ्य यह है कि कोई भी अखबार वेतन आयोगों की सिफारिशों को ईमानदारी और सच्ची भावना से लागू नहीं करता है. यही नहीं, पिछले डेढ़-दो दशकों में लगभग ८० से ९० प्रतिशत अख़बारों में पत्रकारों की अस्थाई और संविदा पर नियुक्ति के कारण वेतन आयोग पूरी तरह से बेमानी हो चुका है.
हकीकत यह है कि अधिकांश बड़े और मंझोले अख़बारों में ज्यादातर पत्रकारों की तनख्वाहें और सेवाशर्तें लगातार बद से बदतर होती चली गई हैं. यहाँ तक कि बड़े अख़बारों में भी संपादक सहित मुट्ठी भर पत्रकारों को छोड़ दिया जाए जिन्हें संविदा सिस्टम का लाभ मिला है तो बाकी ८० फीसदी पत्रकारों की तनख्वाहें बहुत कम हैं. खासकर निचले स्तर पर उप संपादकों और रिपोर्टरों की तनख्वाह सरकारी और निजी क्षेत्र के महकमों के सबसे निचले कर्मचारी से भी कम हैं.
यही नहीं, सबसे गंभीर चिंता की बात यह है कि कुछ अपवादों को छोड़ दिया जाए तो लगभग सभी अख़बारों और चैनलों में पत्रकारों और गैर पत्रकारों की यूनियनें नहीं रह गई हैं. अधिकांश यूनियनों को धीरे-धीरे खत्म कर दिया गया है और जो बच गई हैं कि उनके नेतृत्व को खरीद लिया गया है.
नतीजा यह कि पत्रकारों और गैर पत्रकारों के पास वेतन और अन्य सेवाशर्तों के मामले में प्रबंधन के साथ सामूहिक मोलतोल की क्षमता नहीं रह गई है. वे पूरी तरह से मालिकों की दया और मर्जी पर निर्भर हैं. इस तरह मालिकों ने प्रेस की आज़ादी को अपनी चेरी बना लिया है. सच पूछिए तो प्रेस की आज़ादी को असली खतरा अखबार मालिकों की इसी तानाशाही से है.

यकीन मानिये, मजीठिया वेतन बोर्ड के कारण कोई अखबार बंद नहीं होने जा रहा

जस्टिस मजीठिया आयोग ने श्रमजीवी पत्रकारों के वेतनमान पर रिपोर्ट दी है. सबका दर्द सुनने-सुनाने वाले पत्रकारों के बड़े हिस्से को वेज बोर्ड के बारे में कुछ मालूम नहीं होता, इसका लाभ मिलना तो दूर. इसके बावजूद अखबार प्रबंधंकों ने वेज बोर्ड को मीडिया पर हमला बताकर हल्ला मचाना शुरू कर दिया है. जबकि मीडिया पर असली हमला तो पत्रकारों का भयंकर आर्थिक शोषण है. आखिर इतनी कठिन परिस्थितियों में लगातार काम करके भी एक पत्रकार किसी प्रोफेसर, सीए, इंजीनियर, डॉक्टर, आइएएस या कंप्यूटर इंजीनियर से आधे या चौथाई वेतन पर क्यों काम करे? अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता चाहिए तो यह सवाल हर नागरिक और हर मीडियाकर्मी को पूछना चाहिए. 
कोयलाकर्मियों और शिक्षक-कर्मचारियों की तरह मीडियाकर्मियों को भी अपने वेज बोर्ड के बारे में जागरूक होना चाहिए. वरना अखबार प्रबंधकों की लॉबी तरह-तरह से टेसुए बहाकर एक बार फिर पत्रकारों को अल्प-वेतनभोगी और बेचारा बनाकर रखने में सफल होगी.
आज जो अखबार प्रबंधक नये वेज बोर्ड पर आंसू बहा रहे हैं, उन्हें नहीं भूलना चाहिए कि उनके प्रोडक्ट यानी अखबार में जो चीज बिकती है- वह समाचार और विचार है. अन्य किस्म के उत्पादों में कई तरह का कच्चा माल लगता है. लेकिन अखबार का असली कच्चा माल यानी समाचार और विचार वस्तुतः संवाददाताओं और संपादनकर्मियों की कड़ी मेहनत, दिमागी कसरत और कौशल से ही आता है. इस रूप में पत्रकार न सिर्फ स्वयं कच्चा माल जुटाते या उपलब्ध कराते हैं, बल्कि उसे तराश कर बेचने योग्य भी बनाते हैं.
इस तरह देखें तो अन्य उद्योगों की अपेक्षा अखबार जगत के कर्मियों का काम ज्यादा जटिल होता है और उनके मानसिक-शारीरिक श्रम से कच्चा माल और उत्पाद तैयार होता है. तब उन्हें दूसरे उद्योगों में काम करने वाले उनके स्तर के लोगों के समान वेतन व अन्य सुविधाएं पाने का पूरा हक है. दुखद है कि मीडियाकर्मियों के बड़े हिस्से में इस विषय पर भयंकर उदासीनता का लाभ उठाकर अखबार प्रबंधकों ने भयंकर आर्थिक शोषण का सिलसिला चला रखा है.
जो अखबार 20 साल से महत्वपूर्ण दायित्व संभाल रहे वरीय उपसंपादक को 20-25 हजार से ज्यादा के लायक नहीं समझते, उन्हीं अखबारों में किसी चार्टर्ड एकाउंटेंट, ब्रांड मैनेजर या विज्ञापन प्रबंधक की शुरूआती सैलरी 50 हजार से भी ज्यादा फिक्स हो जाती है. सर्कुलेशन की अंधी होड़ में एजेंटों, हॉकरों और पाठकों के लिए खुले या गुप्त उपहारों और प्रलोभनों के समय इन अखबार प्रबंधकों को आर्थिक बोझ का भय नहीं सताता. चार रुपये के अखबार की कीमत गिराकर दो रुपये कर देने या महज एक रुपये में किलो भर रद्दी छापने या अंग्रेजी के साथ कूड़े की दर पर हिंदी का अखबार पाठकों के घर पहुंचाने में भी अखबार प्रबंधकों को गर्व का ही अनुभव होता है. लेकिन जब कभी पत्रकारों को वाजिब दाम देने की बात आती है, तब इसे मीडिया की स्वतंत्रता पर हमले जैसे हास्यास्पद तर्क से दबाने की कोशिश की जाती है.
आज इन मुद्दों पर एक सर्वेक्षण हो तो दिलचस्प आंकड़े सामने आयेंगे-
1. किस-किस मीडिया संस्थान में वर्किंग जर्नलिस्ट वेज बोर्ड लागू है?
2. जहां लागू है, उनमें कितने प्रतिशत मीडियाकर्मियों को वेज बोर्ड का लाभ सचमुच मिल रहा है?
3. मीडिया संस्थानों में प्रबंधन, प्रसार, विज्ञापन जैसे कामों से जुड़े लोगों की तुलना में समाचार या संपादन से जुड़े लोगों के वेतन व काम के घंटों में कितना फर्क है?
4. मजीठिया वेतन आयोग के बारे में कितने मीडियाकर्मी जागरूक हैं और इसे असफल करने की प्रबंधन की कोशिशों का उनके पास क्या जवाब है?
5. जो अखबार मजीठिया वेतन आयोग पर चिल्लपों मचा रहे हैं, वे फालतू की फुटानी में कितना पैसा झोंक देते हैं?
जो लोग यह कह रहे हैं कि पत्रकारों को वाजिब वेतन देने से अखबार बंद हो जायेंगे, वे देश की आखों में धूल झोंककर सस्ती सहानुभूति बटोरना चाहते हैं. जब कागज-स्याही या पेट्रोल की कीमत बढ़ती है तो अखबार बंद नहीं होते. दाम चार रुपये से घटाकर दो रुपये करने से भी अखबार चलते रहते हैं. हाकरों को टीवी-मोटरसाइकिल बांटने और पाठकों के घरों में मिठाई के डिब्बे, रंग-अबीर-पटाखे पहुंचाने से भी अखबार बंद नहीं होते. प्रतिभा सम्मान कार्यक्रमों और महंगे कलाकारों के रंगारंग नाइट शो से भी कोई अखबार बंद नहीं हुआ. शहर भर में महंगे होर्डिंग लगाने और क्रिकेटरों को खरीदने वाले अखबार भी मजे में चल रहे हैं. तब भला पत्रकारों को वाजिब मजूरी मिलने से अखबार बंद क्यों हों? इससे तो पत्रकारिता के पेशे की चमक बढ़ेगी और अच्छे, प्रतिभावान युवाओं में इसमें आने की ललक बढ़ेगी, जो आ चुके हैं, उन्हें पछताना नहीं होगा. इसलिए यकीन मानिये, मजीठिया वेतन बोर्ड के कारण कोई अखबार बंद नहीं होने जा रहा. वक्त है पत्रकारिता को वाजिब वेतन वाला पेशा बनाने का. सबको वाजिब हक मिलना चाहिए तो मीडियाकर्मियों को क्यों नहीं?
एक बात और. पत्रकारों की इस दुर्दशा के लिए मुख्यतः ऐसे संपादक जिम्मेवार हैं, जो कभी खखसकर अपने प्रबंधन के सामने यह नहीं बोल पाते कि अखबार वस्तुतः समाचार और विचार से ही चलते हैं, अन्य तिकड़मों या फिड़केबाजी से नहीं. प्रबंधन से जुड़े लोग एक बड़ी साजिश के तहत यह माहौल बनाते हैं कि उन्होंने अपने सर्वेक्षणों, उपहारों, मार्केटिंग हथकंडों, ब्रांड कार्यक्रमों वगैरह-वगैरह के जरिये अखबार को बढ़ाया है. संपादक भी बेचारे कृतज्ञ भाव से इस झूठ को स्वीकार करते हुए अपने अधीनस्थों की दुर्दशा पर चुप्पी साध लेते हैं. पत्रकारिता का भला इससे नहीं होने वाला. समय है सच को स्वीकारने और पत्रकारिता को गरिमामय पेशा बनाने का, ताकि इसमें उम्र गुजारने वालों को आखिरकार उस दिन को कोसना न पड़े, जिस दिन उन्होंने इसमें कदम रखा था.

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